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बेटियां  बेटियां  होती  घर समाज की धड़कन , हर पल खिलता इनसे घर गुलशन , समाज की बागडोर थामे बनती कुल की हरदम शान,  इनको कभी पराया न समझना ,है  यह तो हम सबकी जान !! इन्हें बस जरुरत प्यार व् विश्वास की , मत समझना इन्हें बोझ अपने समाज की , वक़्त के साथ इन्हें भी सिखाएं दौड़ने की , दहेज़ के दानवों से बचाकर रखो अपनी लाडली को ! बुढ़ापे का सहारा होती बेटियां , सुख दुःख में सहारा होती बेटियां , परिवार के दुःख में दुखी होती बेटियां , अपने गम छुपाकर सदैव हँसाती  बेटियां ! बेटी दिवस पर हम सब को बधाई !!
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ख़ामोशी  प्रकृति  की  देख  अजब पहेली , जिसकी न संग कोई सहेली , धूप छाँव संग नित्य खेली , फिर भी जाने क्यूँ  है अकेली ! भोर की बेला या दोपहर की चुभन , साँझ की लाली या रात काली इस गगन , प्रकृति  की ख़ामोशी  से रुकी धड़कन , मायाव्यी  लगते अब इसके हर उपवन ! उदासी व् क्रुन्दन  का माहोल से होती भोर  बेबसी  का आलम  छाया हर छोर  मंजिलो की तलाश में भटकता मुसाफिर  शुष्क भावनाओं की बढती भीड़ चारों ओर ! कभी हंसती थी इसकी डाली डाली , चारो ओर फैली  रहती  खुशहाली , अब देखो  विपदाओं से है बदहाली , इंसानियत  का कत्ल हो रहा गली गली ! कहीं मजहबी दंगे तो कही रोटी की लूट ,  अमानवीय मूल्यों पर चढ़ रही  युवा पीढ़ी की भेंट , शिक्षा या रोजगार आरक्षण बनाम अत्याचार का बढ़ रहे रेट, खामोशियों से न  भरें    इस बढते भ्रस्टाचार से ग्रसित लोगों के पेट  !
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संघर्ष  जीवन की लहरों पर अडिग बनना होगा चट्टान सा , वक़्त के थपेड़ों  को सहर्ष  स्वीकारना होगा , जीवन के संघर्ष  को  झेलना होगा बन  विराट  समुद्र   सा , वक़्त  पर लेने होंगे  कुछ उन्नत  निर्णय  जीवन पथ के अदृश्य  मोड़ पर बढना होगा  बादलो सा , वक़्त के दिए जख्मों को भुलाकर बढ़ना होगा , जीवन दृष्टीकोण  बदलकर  नवजीवन  की ओर इन्द्रधनुष  सा !! 
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मेरी पहचान है हिंदी   हर्षित करती ह्रदय हिंदी , हल्की न समझना हँसती हिंदी , हिमालय पर हिम समान हिंदी , झर -झर  बहती घर -घर हिंदी , अंग्रेजी को हाँका करती हिंदी , ह्रदय  को विराट करती हिंदी , सब भाषाओ से सरल हिंदी , देश प्रेमियों को भाये  हिंदी  हमारा सम्मान है हिंदी , अपने व्यवहार में लाओ हिंदी , सब भाषाओँ का सम्मान पर स्वाभिमान हिंदी , हिंदी दिवस पर न करो अपमान कहती हिंदी , मूल अपना पहचान बोलो  बस   आज  केवल हिंदी , लीडरों ,वक्ताओं  से है विनती केवल अपनाओ हिंदी, विदेश में  माना पहचान अंग्रेजी पर संस्कृति है हिंदी , याद रखें सदैव  हिन्दुस्तान की पहचान है हिंदी, आओ मिलकर हम सब कहें मेरी पहचान है हिंदी !! 
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आशा की किरण धुंधले जीवन में आई एक  आशा की किरण  बिखरे सपनो में बन उम्मीद की डगर  उड़ना है और नभ छूने  की ख़ुशी की लहर  पंगु जीवन को मिली वैसाखी  का आसरा  मन के मोती शब्दों की माला बनी अब जीवन धारा दर्द  के  रिश्ता पर वक्त की शीतल छाया !! 
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दो सखा  गूंगापन  और एकाकीपन चल रहे संग संग  आत्मा की लहरियां और शब्दों के मोती चल रहे संग  संग  ह्दय  की तस्वीरें और कागज  पर लेखनी  रहती संग संग  आपहिज तन और स्वालंबी  मन चल रहे संग संग  जीवन की शून्यता  और खोखली मुस्कराहट रहती संग संग  सपनो के झरोखे और वर्तमान का संघर्ष रहते संग  संग  नयनो के अश्रु और यादों का सागर रहते संग संग  ईर्ष्यालु प्रवृति  और परस्पर प्रतियोगी रहते संग संग !
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आस  मेरे मन की...... अपने आदर्शों से दूसरों  के स्वाभिमान  न कुचलना , अपने सोच की धरोहर से दूसरों को अपमानित न करना , अपनी बातों की महिमा में दूसरों का तिरस्कार न करना , अपनी संकुचित मानसिकता से दूसरों का हृदय अवसादित न करना ! अपनी आजादी के लिए दूसरों को पराधीन मत करना , अपना शीश के अहंकार में दूसरों के शब्दों की अवहेलना  न करना , अपने मन के भाव खिलाने में दूसरों के मन को मत रौदना , अपने तन के घाव भरने के लिए दूसरों को घाव न देना ! अपने बोझिल चिन्तन से दूसरों को हतोसाहित न करना , अपने बंजर धरती के रंज में दूसरों को रंज मत देना,  अपने पत्थर  दिल से दूसरों को प्रताड़ित न करना , अपने मन को विशाल बनाकर समाज कल्याण में तत्पर रहना !
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सदैव  मिलन -जुदाई  जीवन के अटूट सत्य सदैव , सुख -दुःख जीवन के दो प्रेरक पन्ने  रखे याद सदैव , जीवन - मरण  जीवन चक्र के अडिग नियम  हैं सदैव , उम्मीद - प्रसन्नता   डगर है अनमोल ,निभाहो  इन्हें सदैव , वक्त की सौगात हैं ये मोती ,सहर्ष  स्वीकार करो सदैव,  पल -पल  में तर्क कर अमूल्य  समय को संभालो सदैव , मिलन की मृगतृष्णा  में  जुदाई का भ्रम से बचो सदैव,  सुख की लालसा में दुखियों  से छल कपट  न करना सदैव , जीवन में सत्कर्म -मरण में मोक्ष का ध्येय  हो सैदेव , उम्मीद का दीप  व् प्रसन्नता  की बाति लाती मधुरता सदैव !!
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सफरनामा   (भाई  को समर्पित ) जीवनसंध्या में आज फिर याद आ गया बचपन  कुछ स्याह ,कुछ धूमिल सपनो में डूबा चितवन  तेरा साथ क्या छूटा , टूट गया मन दर्पण , तस्वीर में छिप गया और छलकते रहते हरदम नयन लहू का रूह से पुकार है अनमोल , गमो के सागर में ही तो इनका मोल , बीते वक़्त की भाँती कडवे इसके बोल , मौत के फरिस्तों के हृदय पट भी देता यह खोल ! वक्त के हासिये में छूट जाते हैं वो अनमोल पल रह जाते हैं बस अवसादों से भरे मन की हलचल जिन रस्तों में गूंजती थी उसकी मधुर बोलचाल आज अम्बर पर खामोशियाँ और ठहरे हुए हर ताल ! समय ने करवट बदली ..फिर आ सामने खड़ा वह आया जीवन की घुटन भरे अहसासों में बन वह मधुर साया अपने मीठे बोलों से ,बन जीवन उथान के अनमोल विश्वास काया वह भी अब क्यूँ खुली आँखों का वह सपना बन बिछड़ गया !!
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कशमकश  स्वागत था जिनका रुपहले धूप में , उन्हें वक्त के साथ अँगार बनते पाया ! भावों के साथ हुयी नाइंसाफी में , जंजीरों में शब्दों को जकड़ा पाया ! जीवन की मखमली घास की बगिया में , रिश्तों को कीकड़ सी चुभन  पाया ! सकूं थी जिनकी बातो और वादों में, रंजिशों के जुल्म का दरख्त  पाया ! भरोशा था हरदम  जिनके अस्तित्व में , उनको  शोहरत के बाजार में नीलम होते पाया ! रूहानियत के आंसुओं के सैलाब में , नरगिसी सपनों को ही बिखरा पाया ! अजनबी सा इस फूलों के चमन में , खुशबुओं  का कुटिल व्यापारी बनता पाया  ! अब रंजो गम  नही उन अहसासों में , जिन पर  रूह ने तेरा आशियाना बिखरा पाया !! 
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प्रहरी  धरती की इस विराट नगरी  में अडिग खड़ा रहता सदैव प्रहरी  पहाड़ों व् कन्दराओं में खड़े साये आतंकी  मौसम की जटिलता को सहर्ष  स्वीकारे प्रहरी मानवतावाद व् देश प्रेम तो दिखता इसमें हर घड़ी  आतंकी आक्रमण हो यदि कहीं  सीने पर हँस कर खाता  वह गोली  कुदरत  की मार गर पड़े समाज पर कभी  फिर  करता पहरेदारी बन अडिग प्रहरी  कर्तव्य पथ पर सदा बढ़ता प्रहरी  देश सुरक्षा  में समर्पित रहते ये सदा  समाज की कृपा दृष्टी को तरसते ये प्रहरी  वीरगति के बाद मिलती इनको ख्याति  नही पहचान उसकी जब तक नही पहुंचती अर्थी  इन्हें तो बस चाहत  हमारे प्रेम व् प्रोत्साहन  की  अपनी माँ का आँचल छोड़कर जाना आसन नहीं  अपनी  बहिन का स्नेह को ठुकराकर जाना सरल नहीं  अपनी हमदम  का साथ भुलाकर जाना आसन नही  अपनी मात्रभूमि पर जान न्योछावर  करना आसन नहीं  भावनाओं  को कर  ह्रदय में कैद फ़र्ज़ निभाता  प्रहरी  ...
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पश्चाताप  मन की कुंठाओं  के बढ़ते अवसाद में  मनुष्य करता नित्य  दिन कुछ गलतियाँ  अपने उग्र स्वभाव के आगे तुछ  हो जाती मनुजता  जब असहाय  हो वेदना भेद जाती हृदय को  तब उन  रिसते नासूरों से उठता है पश्चाताप  निश्चल  आँसू तब भिगो जाते सारे चितवन को  पश्चाताप के डोर थामे तब क्षमादान माँगती आत्म साक्षात्कार  जब हो जाये देवतुल्य  अमृतधारा बन जाती हैं पश्चाताप के भाव  विवेक खोती  चिंतनधारा पर वैकुंठधाम  यह पश्चाताप   हर पल बढ़ते वैर वैमनस्य पर लगाता सदा विराम !
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फेसबुक व् रिश्ते फेसबुक  पर  रिश्तों की महिमा बड़ी विचित्र  कहीं पर जन्म जन्मान्तर के रिश्ते हैं बनते  अटूट दोस्ती के  मिशाल भी यहीं  पर बनते  सुख दुःख साँझा करने का अद्भुत मंच यहीं हैं बनते  पर यहीं  बेरहम  लोग  रिश्तों की कद्र नहीं जानते एक दूसरे  की भावनावों  को नहीं पहचानते   लोग अपनों के साथ ही विश्वाशघात किये जाते हैं  ये  दुनिया है घोटालों की दुनिया ,दिल यहीं तोड़े जाते हैं  दोस्तों की बातें भरी महफिलों  में उड़ाई  और  जग हसाई की जाती है  इस मंच पर सभी मोखोटा लिए बैठे हैं ,और दूसरों  का परिहास किये जाते हैं  इस सुंदर मेल मिलाप के जगत को क्यूँ हो प्रदूषित करते  अपनी चंद लम्हों की ख़ुशी की खातिर दूसरों का हृदय भेदन करते  मान बड़ाई सभी को  प्यारी ,सबका  स्वाभिमान का ध्यान क्यूँ नहीं रखते  अपने प्रशसको व् मित्रों  के शब्दों को  प्रोत्साहित नहीं कर सकते तो हतोसाहित भी क्यूँ हो करते  लड़कि...
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इंसानियत  इन्तजार इन आँखों से अब जुदा हुआ  शायद कोई टूटा तारा कहीं दफ़न हुआ  खुद अपनी बस्ती  जलाकर भी दीदार न हुआ  जिसके लिए ताउम्र जगे वही  शायद अब रुक्सत  हुआ  भीड़ से भरी महफिलों से शायद वह  तन्हा  हुआ  शब्दों के पथराव से शायद  वह  घायल हुआ  वक्त  के  अंधियारे गलियारे में शायद वह गुम हुआ  हुकुमरानो की बड़ी दुनिया में वह नितांत एकांकी  हुआ  बचपन  की कसक ,यौवन  की ग्लानी में वह खाक  हुआ  चिंतित मन में अवसादों का सैलाब गहरा हुआ  रात के भयावह  सायों में उसका अक्ष  धूमिल हुआ  समय के कुचक्र में  वह  पूरी तरह उलझा हुआ  मायूसी के आलम में वह खुशनुमा न हुआ  जीने की उमंग से मानो वह बेज़ार हुआ  कोमल लफ्जो की भटक में वह नीलाम हुआ  कुदरत के सितम से टूट  कर  वह खुदी हुआ  कुछ  कर गुजरने की चाह में वह मदहोश  हुआ  दीपक सा रौशन उसका दिन फना हुआ  प्रकृति के ख...
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देखो धरा  रो रही है ... देखो धरा रो रही है ....... चारो ओर फैलता देख वैर -वैमनस्य , नैतिकता रौंदी जा रही अनैतिकता के हाथों देखो धरा रो रही है ....... अवचेतन होती मूल्य धारा से , ममता छिन रही बर्बता के हाथों ! देखो धरा रो रही है ....... मूर्छित हो रही वज्र कठोर धर्मनीति अब , कुलाचे मार रहे आतंकी निर्ममता के हाथों , देखो धरा रो रही है ....... हिंसक बनती उसकी रचना , निष्क्रिय होता मानव आत्मबल शोषण के हाथों ! देखो धरा रो रही है ....... जाती पाती की विभस्तथा बढ़ रही , बन रही महाकाल रंजिशों के हाथों ! देखो धरा रो रही है ....... कास्तकारों के उजड़े बंजर भूमि , बन रही बली बिजली कटौती के हाथों ! देखो धरा रो रही है ....... धर्म क्षेत्रवाद से बंट रहा रास्ट्र , स्वर्ग सी इस धरा को रौंद रहे आन्दोलनों के हाथो ! देखो धरा रो रही है ....... मोह ,माया ,मृगतृष्णा से शुब्ध सब जन , कुचल रही मानवता बढती महंगाई के हाथों ! देखो धरा रो रही है ....... बिसर चुके हैं परतंत्र की बेडी, स्वतंत्रता खो रहे हैं ,विदेशी पूंजीपत्ति के हाथों ! देखो धरा रो रही है ....... देखो धरा रो रही है ........
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रेत के कण  रेत  के  कणों  में छिपा जीवन का सार , पल पल जीवन  के घटते  दिनों का आधार! भोर की बेला में स्वर्णिम इसकी किरण , जैसे फैलती शिशु के मुख का  भोली सी मुस्कान ! सुबह -सुबह नदी तीरे पंछियों का रेत पर देख कलरव , याद आते हैं बचपन के वे  खिलखिलाते पल ! सूर्य की गर्मी से तपते इसके अंश , जैसे जीवन में युवावस्था की बढती उमंग ! दिन में इन्ही रेत के कणों  का तपकर सुर्ख होना , प्रोढ़ावस्था में ज्ञान के सरोवर में  सबका जीवन ! चाँदनी की ठंडक से मिलती इनमे शीतलता , जैसे जीवन की सांझ में बढ़ते बचपन को छूने  का  सकून ! मुट्ठी  खुलने पर हाथो से इनका खिसकना , यूँ ही होता जीवन का मृत्यु से सामना ! बहुत समय से अजमा रही जैसे प्रकृति , रेत से अडिग धूप - छाँव  की आसक्ति !
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जीवनदर्शन  ईश्वर को अलभ्य जान ,जीवन को यूँ नष्ट  न करो , जीवन चक्र  के अनमोल पल ,परहित में न्योछावर करो  ! वाणी मिसरी सी हो ,कर्म चींटियों सा तुम निसदिन करो , इस परिवर्तनशील जगत में  न किसी के संग दुर्व्यवहार  करो ! स्पर्श ईश्वर का करना हो तो सम्पूर्ण उसका ध्यान करो , मृदुल भाव से शीश झुककर ,इस जग में ऊँचा नाम करो ! प्रतिदिन की भागदौड़ में एक प्रहर  उसको तुम  याद करो , अपने भोजन की एक थाली  ,दूसरों के हित में त्याग करो ! अपने ज्ञान के दीपक से दूसरों का जीवन तुम रोशन करो , व्यसनियों  का बहिष्कार  न कर उनका जीवन उन्नत करो ! असाध्य रोगों से लड़ रहे जीवन की तुम भरपूर सेवा करो , अपने आत्मिक उथान की धारा निसदिन तुम प्रबल करो !
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अपमान  इस युग में नारी झेल रही अपमान  हर कहीं , घर आँगन सरे  बाजार नीलाम हो रही , कलयुगी संबंधों की मार पड़ी सभी रिश्तों पर  नारी आँसू को देख निर्लज संसार खूब हँस रहा , संसार में नारी देखती पुरुषों में प्रेम सरिता  पिता ,पति ,पुत्र ,भाई व् मित्र की तस्वीर में , किन्तु  कलयुगी  पुरुष की बढती  विसंगति में  हर रिश्ते उसे बस आँसू  समन्दर भर  देते रहे , पिता समझता उसे बोझ  अपनी कमाई पर , पति की वह तो जीवन कठपुतली सी , पुत्र उसे समझता बोझ  जीवन भर का , भाई हर पल करता खिलवाड़ उसकी भावनाओं  का , मित्रता  की चाह में वह जिस ओर  बढ़ी , पुरुष मानसिकता के व्यभ्याचारी मिले , हर क्षेत्र में ,हर डगर में मिला उसे  बस  अपमान व् अन्याय  का  उपहार , इस धरा पर नारी न जाने कबसे ...  हो रही कलंकित  अपनों के हाथों , कहीं आत्महत्या तो कहीं ख़ामोशी  को लगा गले  जूझ रही  समाज को   हर देश प्रदेश मे...
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जागरण  जागरण बनाम दिखावा का जोर हर कहीं , ईश्वर  की पुकार होती गली गली  जागरण बनाम शोरशराबा का शौक  हर कहीं  बहरा  करने का ठेका लेते गली गली  जागरण बनाम आडम्बर का बढता रिवाज हर कहीं  असहाय को ठुकराकर मौज मानते गली गली  जागरण बनाम अध्यात्मवाद का कुचलन बढ़ रहा हर कही  मिथ्या को अपनाकर विवेक खोते गली गली  जागरण बनाम निन्द्राहर्ण  का बढ़ता फैशन  पीड़ितों ,शिशुओं और बुजुर्गों को प्रताड़ित करते गली गली  जागरण बनाम धार्मिक विज्ञापन का दौर हर कहीं  अंत :करण को झुठलाकर,ज्ञानी बन रहे सभी गली गली , जागरण बनाम ध्वनि  प्रदूषण का फैलता आचरण  हर कहीं , रौद रहे  मनुजता ,ईश्वर को मानाने  में गली गली !!
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स्याह  बचपन  संघर्षों  में गुजर रहा है स्याह सा बचपन , दिन भर की कड़ी मेहनत में ढूंढता अपनापन , घर का कर्ज मिटाने फर्ज़ बन आया दूसरे आँगन , पालनहार की तिजोरी भरने हेतु पिटता हर क्षण , झूठन भर मिले न मिले नही जाने इसका मन , सख्त  जीवन को झेल रहा जिसका तन , लताड़ व् मार में गुजर जाता जिसका सारा दिन , कूड़े  की ढेर मैं बैठा  सिसक  रहा  देखो  स्याह बचपन !
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विश्वास  वह आया ओस  की बूँद सा , सूर्य की किरणों में चमकता मोती सा , गूंगी जिह्वा  में स्वरलहरी  सा , हर पतझड़  में बरखा की फुहार सा , चंचल  मन में विराट  समुद्र  सा ! वह आया फूलों  में मकरंद  बन , काली   अमावस  में  पूर्णिमा सा बन , कंटक से भरे रास्तों में कालीन सा बन , भरी दुनिया में सितार सा बन  तिरस्कृत  जीवन में उपहार सा बन ! वह आया क्रोध को शांत करने को , धरती में फैली नफरत मिटाने को , आडंबर से फैली  अज्ञानता हटाने को  सुप्त होती मनुजता जगाने को , कुरीतियों  रहित समाज बसाने  को !!
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कैसे ...न ..जाने कैसे  दामन के काँटों और आँखों के आँसू  दिखाऊँ  कैसे , जीवन भर जो  मिला उन्हें छिपाऊँ  कैसे , पल भर की ख़ुशी और फिर वही  पल  सँभालूँ  कैसे , हर दर्द को तकदीर बनाकर समेटूं  कैसे , वक़्त के बेहरहम  चोट  को  भुला  दूँ कैसे , दूसरों  की ख़ुशी मैं अपनी लाचारी का गम मिटा दूं कैसे , तकदीर से  निस दिन बढती  उलझन सुलझाऊं  कैसे , शब्दों में छिपे भाव व् भाव में छिपे शब्द पढाऊँ कैसे , मेरे ख्वाब ,मेरी तन्हाईयाँ और तेरी रुसवाई निभाऊं कैसे , दर्द का बढ़ता  सैलाब और उफनती ज्वाला बुझाऊँ कैसे , मेरा तेरा की बहस में जीवन बिताऊँ कैसे !
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तिरंगे की लाचारी  १५ अगस्त को मनाई जाती तिरंगे की आजादी , पर नहीं दिखती किसी को क्या इसकी लाचारी ? दिनोदिन नहीं बढ़ रही क्या इसकी बेबसी ? भारत माँ की बेटियों की लुट रही अस्मत गली -गली , भूख ,दहेज़ ,जातिवाद ,धर्मवाद भ्रूणहत्या ,हिंसा इसे रुला रही , फिर भी देखिये हम सजा रहे झाँकी आजादी की , अनाचार, दुराचार ,व्यभयाचार व् भ्रस्टाचार की बढ़ रही आँधी , कला में नग्नता और फूहड़ता परोस रहे पर भविष्य की चिंता नहीं , भेदभाव में देखो गरीबों के अरमान व् प्रतिभा कैसे बिक रही , जीवन उथान के हर मोर्चे पर कैंसर बन रही रिश्वतखोरी , शहीदों की क़ुरबानी जैसे बन चुकी देश की लाचारी , तिरंगे का क्या सम्मान जब फ़हराने तक का ज्ञान नहीं , रौंद रहे इसके मान सम्मान को ,पैरों की समझकर जूती , राजनीती तो जैसे बन चुकी है तिरंगे की फाँसी , बेच रहे निज स्वार्थ में तिरंगे की अनमोल ख़ुशी , भूल चुके पराधीनता की वो खौफनाक व् दर्दनाक कहानी , और देखो क्या धूम से मनायेंगे सभी तिरंगे की आज़ादी !! १४ /८/२०१२
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HUMANITY In this world of vivid souls, Everyone is after reaching ones goal  Oh ! My soul in the search of humanity ,tries to find God , Where ever  I go for the exclusive identity , In search of Heart with prints of compassion , To understand love and brotherhood, To bring salvation with kindness and gratitude , To  bring peace in every distress soul , To wipe tears of all destitute , To bless an orphan ,handicapped,and lovers of humanity, To bring laughter in resentful souls, Oh! My Almighty ,give me courage ,strength and wisdom, To serve humanity not by words but in action , So that this world of vivid souls feels your touch .
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मानव  देखो इंसानियत से भागता आज मानव  मिथ्या का आवरण ओढ़ता मानव  अपनी छवि को संवारने में मदहोश मानव  दूसरों के कंधो पर से वार करता आज मानव  अपने अहंकार में रिश्तों की बुनियाद हिलाता मानव  प्रेम ,प्यार ,वात्सल्य को दरकिनार कर विश्वाश को दंश देता मानव ...... देखो इंसानियत से भागता आज मानव  इर्ष्या ,द्वेष का आवरण  ओढ़ता  मानव  अपने अहंकार  में मदहोश मानव  छोटे   मोटे  विवाद  को  विषाद  बनाता  मानव  जीवन अर्पर्ण से खिलवाड़  करता मानव  घर ,गली ,शहर ,नगर  में हिंसा  फैलता मानव ........... .देखो धरती से विश्वाशघात  करता मानव  प्रदुषण ,वन्नोमूलन ,और हिंसा का आवरण ओढ़ता  मानव  अपने निज स्वार्थ की खातिर धरती का विनाश करता मानव  लहुलुहान होती माटी पर अपने विवेक को खोता मानव  बर्बरता व् पशुता सा जीवन जीता मानव   खून का प्यासा बन रौंद रहा मानवता को अब मानव ....... .देखो प्रेम को केसे कुचल रहा आज मानव...
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लो  फिर लौटा अश्रुवर्षा  का मौसम  ख्वाबों  में दिखता था जो हरदम , आज तूफ़ान बन फिर उतरा इस धरा पर , बरसा सावन ,बरसा गगन ,बरसे  नयन , आज फिर उसकी यादों ने रुला दिया , तन्हाईयों में जिसका चेहरा देख लेती थी , आज फिर उसी चेहरे ने  रुला दिया , इंद्रधनुषी  सपने   बारम्बार  खंडित होते  रहे , आज फिर द्रवित हुआ हृदय  तेरी यादो में , पूछा रस्तों ने नयनो में अश्रु देखकर , आज वह कौन है ,जो फिर तडपा गया , जिस पेड़ की शाखा सूख  चुकी थी , आज फिर तेरी यादों में भीग गयीं , रूह की तश्वीर बस्ती थी जिसमें , आज वह फिर स्याह  रात बन गयी , जिन धागों में हस्ती थी जिन्दगी , आज वह छूट गयी अश्रुधारा  बन , जीवन भर हँसे खेले जिसके संग , आज फिर लौटा बन  अश्रुवर्षा का मौसम !!
आखिर क्यों ? हे सर्वत्र प्रेम सरिता बहाने वाले श्री लयकर्ता, क्यों तेरी ही बनायीं इस दुनिया में घृणा ,द्वेष व् अराजकता फ़ैल रही है ? क्यों तेरे ही बनाये किरदार एक दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं ? क्यों तेरा गुणगान गाने वालों को रौंदा जा रहा ? क्यों तेरी आस्था के स्थान पर नास्तिक लोगों को पूजा जा रहा ? क्यों कहीं व्यभ्याचार व् कहीं विभस्त चीखें गूँज रही ? क्यों इमानदारी परेशान तो बईमानी हंस रही है ? क्यों तो हे त्रिकाल अभी तक आँखे मूंदे तुम कुछ सोच रहे ? क्यों नहीं हे लयकर्ता ,सर्वत्र व्याप्त इस असंतोष हेतु अपनी त्रिकाल दृष्टी अपना रहे ?
मौत  शब्दों के भयावह झंझावत खामोश हो चले , मन की त्रिश्नाओं में वीरान मौन सिमट गयी , मुस्कुराती फूलों पर घोर विभस्ता छाई , जीवन ज्योति को तिमिर सिन्धु में डुबो गयी, रूह चीत्कार उठी तेरे आने पर ए मौत ! चेहरों पर विभस्त विकराल दानवी चेहरे लिए , घर -घर ,नगर -नगर तेरे स्वरांजलि बने हुए , दहेज़ -वेदी से उत्पीडन ज्वाला लिए हुए , फूलों की सेज से सती कुण्ड तक बिखरी हुए , क्यों लील जाती जीवन ए मौत तू ख़ामोशी लिए हुए ! तुझे बनाने वाला स्वयं आशुतोष कहलाता , फिर तू क्यों इतना विष भीतर छिपाए मासूमो को लीलता , क्यों अनगिनत मासूमो के हृदय को तू दुःख रंजित करता , क्यों इन दहेजी दानवों के जीवन तू बकसता, क्यों न तू इन दहेज़ पिपासु गिद्धों के चीथ्रे उडाता 
इंसानियत के मसीहा  इंसानियत पर देखो आडम्बर का साया है , प्रगतिशील समाज पर विषधर की छाया है , भूख से बिलखता बचपन ,चंद रुपयों का तमाशा है , बसन रहित तन जिनके अक्षि प्यास बुझाते हैं , रजनी जिनके सहचर ,कृशनु जिनका जीवन है , तीर्थस्थलों में कनक चढाते ,पंडो के भरे पेट भरते हैं , वसुधा की त्रास भुलाकर ,व्योम की कल्पना करते हैं , विटप को छिन-भिन क्र पुहुप की चाह रखते हैं , तोयज हृदय में त्रिश्नाओं के मायाजाल बुनते हैं , पन्नग बन इस भव में व्यथा हर पल बढ़ाते हैं , अपने उमंग की खातिर ,वपु का सौन्दर्य बढ़ाते हैं , अमीर द्रुम न बन रंजो गम की अग्नि फैलाते हैं , गरीब की इंसानियत ,अमीर जगत में सुरसरि समान है , भागीरथी सा जीवन जीते गरीब इंसानियत के मसीहा हैं !
विदाई की घडी  विवाह के बाद आती विदाई की घडी , लग जाती है सबके नयनो में अश्रुझर्री, शुभ घड़ी कहीं तो कस्टदाई कड़ी कहीं , समझोता कहीं तो कहीं फर्जों की झड़ी ! विवाह के बाद आती विदाई की घड़ी , वरपक्ष बटोरते नोटों की गड्डी, वधुपक्ष का दर्द समझता वही जिसके ऊपर आन पड़ी , जुदा होती दिल के टुकड़े पर निगाहें अड़ी! विवाह के बाद आती विदाई की घड़ी , अश्रु कहीं तो कहीं आभूषण की देखी जाती लड़ी धैर्य का मोती पहन अज्ञात राह बढ़ चली नई डगर पर द्हेजी दानवी खड़ी ! विवाह के बाद आती है विदाई की घड़ी , अश्रु पीक़े पिता का घर छोड़ चली , कडवे बोल ,जख्मी हृदय न खोल सकी कभी , जीवन -मृत्यु के कट्टु अवसादों में हर पल घिरी ! विवाह के बाद आती है विदाई की घड़ी , आभावग्रस्त जीवन हर पल हँसकर जीती , कन्याओं को यमभेंट क़र न ले सकी सिसकी , जीवन चिता को हंस कर झेल गयी बेटी !!
वक़्त  मैंने पत्थरों में भी अकांक देखे हैं , जिसके निश्चल धरा में जीवन बसते हैं I मैंने पत्थरों में भी फूल देखे हैं , वक्त से टूटे वीराने भी महकते देखे हैं I मैंने पत्थरों में भी फूल देखे हैं , जीवन पतवार धोते रोते हुए देखे हैं ! मैंने पत्थरों में भी इंसान देखे हैं , अपनी पीड़ा मैं दूसरों के प्रेरक बनते देखा है I मैंने पत्थरों में भी फरेब देखे हैं , रिश्तों के बीम मसलते ,नासूर बनते घाव देखे हैं I मैंने पत्थरों में भी आपदाएं भी देखी हैं , अपने वजूद खोकर इंसानियत मिटते देखा है इ मैंने पत्थर में भी भगवान देखे हैं , दूसरों के जीवन हेतु समर्पित इंसान देखे हैं !!