ग्राम की शान यादों के पन्नो से , बचपन की गलियारों में , गाँव की सोंधी माटी की , पावन खुशबू , खो गयी शहर के प्रदूषण में ! भोर की किरणों संग , खिलता था हर घर आँगन , प्रकृति के हर जीव की गूंजती थी , मधुर संगीत , खो गयी शहरी वाहनों के शोर में ! पनघट पर गाती नार , मिलकर करते थे हर कार्य , गाँव की बन धडकन देती थी , एकता का संचार , खो गयी शहरी स्वार्थी गलियों में ! चरवाहों की हंकार मवेशियों के हर दल का कूदना फाँदना बनता था , जीवन की मुस्कान , खो गयी शहरी आपाधापी में ! बैलगाड़ी की टन टन , बच्चों की मस्ती की सवारी बन , ग्राम अर्थव्यवस्था का होता साधन , ग्राम की शान , खो गयी वाहनों के बढ़ते रैले में ! प्रेम और सौहादर्य का प्रतीक , ग्रामीणों का सादगी भरा जीवन , आम पीपल की छाँव तले , बढ़ता जिनका बचपन , खो गया शहरी आधुनिकता के प्रवाह में ! आज शहरी चकाचौंध से दूर , परिकल्पनाओं के आंगन में , ढूंढ रही यादों की अमिट छाप , वे अनमोल क्षण खो गए जो शहरी जीवन की दिनचर्या में !