मुफलिसी 


इस धरा पर रोटी समान मेरे जीवन ने ,
नित्य नए नए अनुभव जिए हैं ,
पकती ,फूलती और जलती रोटी सी ,
मैंने हालात से समझौते किये है ! 

सपनो का महल अब उजड़ गया ,
जबसे हाथ तुम्हारा थामा है ,
जीवन में हर पल खाया धोखा ,
जबसे तुम पर अटूट विश्वास किया है !

 मुफलिसी  भरे इस जीवन में ,
दिल रोज गागर भर रोता है ,
घर के बच्चे- बूढ़े भूखे पेट सोते ,
पर यारों के लिए रोटी सिकती है !

सूखी रोटी से निराश होकर ,
क्यूँ सब पर कहर बरपाते हो ? 
निराश जीवन को नशे में डुबोकर ,
क्या किसी ने कभी सुख पाया है ?

माँ बाबा से क्या शिकायत करूँ जब ,
दहेज का आभाव मुझे यहाँ लाया है ,
जीवन भर बदलाव की एक आस लिए ,
कम खर्चों में घर हरदम सम्भाला है !

कोई नहीं समझा मेरी पीड़ा को ,
हमसफर ही जब साथ नहीं है ,
गरीबी की आग में झुलस रही ,
ख़ुशी की अब कोई आस नहीं है !

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