गुलाबी सपने 

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गुलाब सी नाजुक कली,
बड़ी अरमानो से पली,
छोड़ बाबूल की गली 
पहुँची दूल्हो की नगरी
जहाँ लगती थी बोली 
क्रूर दहेज के लोभी...
थे तौलने  बैठे ,,,
उसके अरमानो की गठरी 
थे जिनमें गुलाबी सपने.....
हल्के थे सो बिखर गए ...
गुलाब के पंखुडियों की तरह ....
धन और गाड़ियों की शक्ल में ....
चंद दिनो के लिए ....
गुलाबी अहसासो में ...
भ्रमित होने के लिए 
और फिर .........
गुलाब सी उसकी जिंदगी 
गुलकंद सी ....,
परोसी जाती ,
या तोड़ी जाती ,
उसकी भावनाए..
मसली जाती ,
और फिर .......
नीरस जान 
फैक दी जाती ...
या जला दी जाती ...
क्योंकि यह ,
अमानवीय व्यापार ,
फिर आरम्भ  होता ..
फिर लगती नयी बोली ,
फिर एक नन्ही कली पर ,
जिसकी आंखो में भी तैरते ,
सुंदर् भविष्य के 
रुपहले गुलाबी सपने ,
वह मासूम कली जो 
युगो से बनती आई 
और जाने कब तक ...,
बनती  रहेगी ,,,,,
दहेज लोभियों की बली !

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