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चित्कारती धरती  गरजता आसमां  दहला रही अंतर्मन  क्यूकर विश्वाश करे  मनुजता खो गयी कहीं  आज की संवेदनहीनता  कागजी भावनाएं  मुर्दादिल इंसान  वहशी ख्वाहिशे  चारो ओर त्राहिमाम !
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मुफलिसी  इस धरा पर रोटी समान मेरे जीवन ने , नित्य नए नए अनुभव जिए हैं , पकती ,फूलती और जलती रोटी सी , मैंने हालात से समझौते किये है !  सपनो का महल अब उजड़ गया , जबसे हाथ तुम्हारा थामा है , जीवन में हर पल खाया धोखा , जबसे तुम पर अटूट विश्वास किया है !   मुफलिसी   भरे इस जीवन में , दिल रोज गागर भर रोता है , घर के बच्चे- बूढ़े भूखे पेट सोते , पर यारों के लिए रोटी सिकती है ! सूखी रोटी से निराश होकर , क्यूँ सब पर कहर बरपाते हो ?  निराश जीवन को नशे में डुबोकर , क्या किसी ने कभी सुख पाया है ? माँ बाबा से क्या शिकायत करूँ जब , दहेज का आभाव मुझे यहाँ लाया है , जीवन भर बदलाव की एक आस लिए , कम खर्चों में घर हरदम सम्भाला है ! कोई नहीं समझा मेरी पीड़ा को , हमसफर ही जब साथ नहीं है , गरीबी की आग में झुलस रही , ख़ुशी की अब कोई आस नहीं है !
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ममता का सागर  ______________ माँ होती ... ममता का सागर अपनी कोमल लहरों के ममत्व से .. अपनी संतानों को जीवन तूफानों से हर पल बचाती , उसकी शांत लहरे और गरजते स्वर , में बच्चो की परवाह  सागर की भाँती कभी शांत और गंभीर , तो कभी ...... हैरत करती आवेग का प्रचंड प्रवाह मानो अपने सृजन को नस्ट करने को आतुर ... किन्तु अपने भीतर ..... ज्वार भाटा समान अनगिनत राज छिपाकर जीवन के सुलभ मोती ममतामयी छाया देती , सदियों से माँ एक शाश्वत सत्य समुद्र की समदर्शी सुख दुःख की लहरों में अमूल्य निधि !
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तकदीर की  तदबीर माँ भारती की तकदीर की तदबीर आज बदल डालेंगे , रेत के पन्नो पर जीवन की नई तस्वीर बना लेंगे ! मृत भावनाओं की बढती विस्तृत मरुभूमि पर , सब मिलकर विश्वास धर्म का सावन बरसा देंगे ! बिखरते रेत से कठिन इस जीवन डगर पर , हम मिलकर भजनामृत का समर ताल ढूंढ लेंगे ! धरा पर शुष्क चट्टानों सी मृत मानवता पर , सौहाद्र के आदर्शों की अब फसल उगा लेंगे ! आज जीवन धूप के विषधर बाणों की शैया पर , सम्भावनाओं की मखमली कालीन बिछा लेंगे ! निसदिन आतंक के सायों से उजड़ते घरौंदों पर , इंसानियत की असख्य मरु कश्तियाँ बढ़ा लेंगे ! माँ भारती के स्वर्णिम आँचल परमिलकर हम सभी , शांति व् भाईचारे और विश्वास के सितारे बुन लेंगे !
जीवन उद्धार  दुखो  से डर कर  कभी, देखो तुम न मायूस होना , दूसरों  की खुशनसीबी  देख कभी आँखें नम  न करना !  इस स्वार्थी  जगत में , निंदा  से  कभी न विचलित  होना , सत्य की डगर मुश्किल है , झूठ के आगे न कभी शीश नवाना , उच्च  चिन्तन के बहाव में , समाज सुधार हेतु सदैव प्रेरित होना , जीवन की सुख दुःख   धारा  में , तुम  ज्ञान की ज्योत जलाना ! दीन दुखियों की सेवा में , तुम  कभी हतास मत होना , दूसरों  के जीवन उद्धार  में , कभी तुम अपना ईमान न डगमगाना ! खतरों से घबराकर  ,कर्तव्य पथ से कभी विचलित न होना , स्वहित त्याग कर ही   तुम भी सबके संग हरदम मुस्कुराना !
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बदलते वक्त में कलमकार. कलमकार के शब्दों में अब समाज कैसे प्रतिबिंबित हो, रोटी के जुगाड़ में कागज और स्याही भी जब रूठी हो, जब दुनिया के अफ़साने लिखने की कीमत भी न मिले, अपने ही बिखरे सपनों को देख मन क्यों न द्रवित हो। समाज की धड़कन कलमकार की पूछ जब न होती हो, सच को सच लिखने वालों की जब न कद्र होती हो, जीवन के विद्यालय में जब अँधेरे में छुपना पड़ जाए, भ्रष्टाचार से बिकती कलामों पर मन द्रवित क्यों न हो। कलमकार के शब्दों में जब इंसानियत ही मिटने लगे, वेदनाओं को अब चाटुकारिता का आडम्बर प्यारा लगे। कलमकार के जीवन में रसखान बनना है आसान नहीं, भरकर उदासी जेबों में लेखन करने में कोई शान नहीं, सच की धारा में अपना अस्तित्व निखार लेना मुश्किल, एवरेस्ट की चोटी चढ़ना जैसा भी दुष्कर है काम नही । कलमकार को बदलते वक़्त के साथ कदम मिलाना होगा, सत्य और निष्ठा के प्रति हर दायित्व को निबाहना होगा। सामाजिक विसंगतियों से उसको समाज को बचाना होगा, अपनी कलम की धार से सब कुरीतियाँ नष्ठ करना होगा।
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प्रेम प्रेम तो  है जीवन श्रृंगार , लाती है खुशियों की बहार , अंतर्मन में बसती  सौंधी खुशबू सी , सुदृढ़ रिश्तों का उत्तम आधार ! सुंदर गीतों से झंकृत संसार ,   प्रेम के  बोल हैं जिसके श्रृंगार , जीवन में प्रेम है ब्रह्मानंद , खोलती सदा उन्नति के द्वार ! प्रेम भावनाओ का है संसार , सुंदर अहसासों का सुदृश्य द्वार , खिलता जिससे मन आँगन , दिलों  का होता जिससे सुंदर श्रृंगार !
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ग्राम की शान   यादों के पन्नो से , बचपन की गलियारों में , गाँव की सोंधी माटी की , पावन खुशबू , खो गयी शहर के प्रदूषण में ! भोर की किरणों संग , खिलता था हर घर आँगन , प्रकृति के हर जीव की गूंजती थी , मधुर संगीत , खो गयी शहरी वाहनों के शोर में ! पनघट पर गाती नार , मिलकर करते थे हर कार्य , गाँव की बन धडकन देती थी , एकता का संचार , खो गयी शहरी स्वार्थी गलियों में ! चरवाहों की हंकार  मवेशियों के हर दल का  कूदना फाँदना बनता था , जीवन की मुस्कान , खो गयी शहरी आपाधापी में ! बैलगाड़ी की टन टन , बच्चों की मस्ती की सवारी बन , ग्राम अर्थव्यवस्था का होता साधन , ग्राम की शान , खो गयी वाहनों के बढ़ते रैले में ! प्रेम और सौहादर्य का प्रतीक , ग्रामीणों का सादगी भरा जीवन , आम पीपल की छाँव तले , बढ़ता जिनका बचपन , खो गया शहरी आधुनिकता के प्रवाह में ! आज शहरी चकाचौंध से दूर , परिकल्पनाओं के आंगन में , ढूंढ रही यादों की अमिट छाप , वे अनमोल क्षण  खो गए जो शहरी जीवन की दिनचर्या में !
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मानवता जग पर पल पल बढ़ते जीवन संघर्ष , धरा पर कैसे हो फिर मानव उत्कर्ष , कलुषित मानवता की परिणिति से बाधित , क्या फिर से मात्र युद्ध होगा निष्कर्ष ? मृत आदर्शों की आधारशिला , जर्जर कर रही जनजीवन , संस्कृति विकास को न्योछावर , जरूरी एक सजग सुगठित संगठन ! जीवन गति का अवरोध क्रोध , मानव साम्राज्य का विध्वंशक , नव संस्कृति निर्माण की लगायें पौध , कारवाँ बढे मानवता बने उसकी परिचायक ! भू प्रेमी निष्ठुर मन का काफिला , बढ़ा रहा अपना आतंक साम्राज्य , दैत्य वंशज का न हो विस्तारण , बढाओ मनुजता दल का निडर साम्राज्य ! बढ़ते आतंक के मरुस्थल पर , मानवता की फसल लगाओ , खून की नदी बहाने वालों को , आत्म निरिक्षण का सुमार्ग दिखाओ !
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मैं और तुम (  नर  और नारी ) नारी तुम मेरे जीवन संगिनी नही प्राण उर्जा हो , तुम्हारे   हर अक्ष का मैं सदा ऋणी रहा और रहूँगा,  सीता, सावित्री,अहिल्या ,कुंती ,द्रोपदी,गांधारी , सब रूपों को पाने का मैंने साहस दुस्साहस किया,  तुमने दया की सम्बल बन सदा मेरा सत्कार किया,  तुम सब रूपों में बनी भारतीय संस्कृति की परिचायक , मेरे मरने पर तुम कभी रणचंडी ,कभी सती कहलाई , मेरे हर जुल्म को तूने सहर्ष स्वीकार किया , मद मैं चूर मैंने तेरा कभी सम्मान कभी अपमान किया , मैंने तेरे तीन रूपों को सदा पूजा और पूजता रहूँगा , पर आज मै और मेरा अस्तित्व तेरी नजरों में क्यूँ गिर गया ? अपने अस्तित्व की लडाई में तूने मेरा तिरस्कार किया , बसनो को कम करना, मर्यादा की सीमा लाँघना क्यूँ तूने सीख लिया ? हम हैं महान अपनी सारी संस्कृति गौरवशाली है ,क्यूँ तूने इसे खंडित किया ? पाश्चात्य संस्कृति को अपनाकर तूने माँ दुर्गा का अपमान किया , आज गाली स्वरूप लगती नारी जबसे तूने मदिरा पान किया , नग्नता की सीमा लांघकर तूने क्या गौरव शोहरत हासिल किया , तेरी इस भूल देख  आज बन गयी अभिश...
 एक चिंतन ---निसदिन  मद का  प्याला   पीकर भटक रहा इंसान , अपने अंतर्मन में विष घोल रहा निसदिन ! रिश्तों के बरगद पर बढ़ रही लालच की बेल , प्रीत की डोरी पर वैमनस्य की छाया पनप रही निसदिन ! धरती माँ की अनगिनत अभिशापित बेटियां , पथरायी आँखों से मुकदर का फैसला देखती निसदिन ! सफ़र ए जिन्दगी  में नीरीव रह गयी इंसानियत , अंगूरी जाम में लिप्त रहता शैतान निसदिन ! देह के सौन्दरीयकर्ण से बाधित मन , अप्राकृतिक प्रसाधनो से भ्रमित होता निसदिन ! मृत दमित मन को जगाने वाले दीप , भजनामृत का मधुर जाम पिलाते निसदिन !
BAITHE THALE मंजिल पाने के लिए बढ़ते सभी  नकरात्मक सोच से उलझते सभी  फौलादी हौसलों से मिलती राहे नयी  सकरात्मक चितन से मिटते भ्रम सभी ....सुनीता  2 इस जग में इंसानियत बेपर्दा जबसे हो गयी , उसी जग में हैवानियत मगरूर तबसे हो गयी , प्रेमी दिलों में फासले अब बढ़ने लगे , वीरानियों में अब जिन्दगी सिसकने लग गयी ! 3 जब कभी अनाज की बरबादी देख रोता किसी का मन , जब कभी देखो डूबे संताप में किसी का घर आँगन , वह जो अपना जीवन जननी मातृभूमि को समर्पित करता , तब समझ लेना वह है माटी का सच्चा उपासक किसान !. 4 माँ की दुआओ में असर इतना , बंदे को कामयाब बना देता कितना , डूबाने का खतरा कोई मोल लेता नहीं , दरिया भी देखता उसका असर इतना ! .. 5 संयुक्त परिवार को समझ बेड़ियाँ , एकल परिवार की पहन चूड़ियाँ , संस्कार विहीन हो रहा समाज , बुढ़ापा बनी अब दुःख भरी घड़ियाँ ! 6 जीवन की सरहद के उस पार प्रभु का द्वार , मानवता रुपी जहाज पर होकर सभी सवार , भूलें सभी वैर वैमनस्य का अब क्रूर खेल , दुनिया में बसा लें अमन चैन का सुंदर संसार ! 7 जिन्दगी के फलसफे में नित्य नए अनु...
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चीनी हुयी फीकी    हमको आपको मधुमेह हो न हो  जेब में नोटों की भरमार हो न हो  सरकार देखिये कितनी फिक्रमंद है  आपको  मधुमेह  से बचा रही है  भारत  समस्त विश्व  में  मीठा  देश  मिठाईयों  से  देता सबको शुभसंदेश  चीनी  को दी है  महंगाई की सौगात  करिए सभी इस  परिवर्तन का सुस्वागत  मधुमेह सम्पन्न  देश  से कुविख्यात  चीनी  महँगी हुई , होगी अब  नई  शुरुवात  जीवन में इस कृत्रिम   मिठास को  भूलें  मानवतावाद की मिठास  हर दिल में घोलें  मीठे बोलों से कर दिन की मधुर शुरुवात  फीकी चाय  मीठे वचन  में अंतर जान  रसगुल्ले  रह जायें फीके तो  नहीं कोई बात   मधुमेह  के जंजाल  से पा लो अब निजात  सभी सम्मानित प्रेरको  को सादर नमस्कार !
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कवि मन जीवन की संभावना रहस्यमयी भयावह स्मृति विस्मृति के आँचल कवि मन मन का भटकाव उन्मुक्त उड़ान का सुदृश्य दर्पण बनता कवि मन समस्यायों का सुलगना पन्नो पर उकेरना समाजसेवा हेतु अर्पित सदैव सजग कवि मन दर्द की पराकाष्ठा पर रिश्तों में सम्भावना तलाशता सदैव यह जिज्ञासु कवि मन समाज के हर रंग का अदभुत दर्शन सुनहरे सपनो का सूक्ष्मदर्शी कवि मन शब्दों का उपवन भावों का गुलशन छूता हर अंतर्मन बने समय साक्ष्य कवि मन सभी सम्मानित सदस्यों को सादर नमस्कार !
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रेत  से सपने  सपनो की उड़ान   वक्त  का पहरा  बोझिल सांसे  हौसले  बुलंद  मन की गति  चंचल   होती  यादों  की परछाईयाँ  तिलस्मी  उचाईयां  बरबस  खींचती  भटकाती ,पटकती  यथार्थ  के  बेदर्द मरुस्थल  जहाँ  सपने  बिखर जाते हैं  मन के इर्दगिर्द  निष्ठुर  रेत  समान 
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  यूँ बने हम भी मूर्ख   वक़्त का परिंदा  कबका उड़ गया किन्तु आज भी मीठी यादे  मन को गुदगुदा जाती है ! बात उस समय की है जब हमारी स्नातकोतर  की परीक्षाएं होने वाली थी ! मैं किसी कारणवश  अपने गाँव चली गयी थी जब  वापिस आई तो परीक्षा में एक दिन शेष था ! परीक्षा सारिणी  घर पर आ चुकी थी तो देखा हमारी परीक्षा 30 मार्च  से आरम्भ  थी , पहली तारीख को कोई परीक्षा न होने के कारण  मैंने अपनी सखी रजनी  संग ,  कॉलेज के सहपाठियों को  बेवकूफ बनाने की योजना बना ली  ! फिर क्या था 29 मार्च को  रजनी और मैंने  साथ मिलकर सभी के लिए कुछ न कुछ सोच कर खूब खुश हो रहे थे ! उसके बाद हमने अपनी प्रथम परचा 30 को देकर  2 तारीख के पर्चे की तैयारी  कर ली थी !31 तारीख साय को हमारे एक सहपाठी  हर्ष  का पेजर  पर मैसेज  आया कि  कल  मेडिसिन की थीसिस जमा करने हैं ,समय 10 बजे ! बस सारी  योजना की मस्ती काफूर हो गयी और रात को 2 बजे तक मौखिक की  तैयारी ...
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इंसानियत इंसानियत चरमरा उठी  पाषाण  ह्रदयों के प्रहार से  शब्द  बिखर गए  भावों  की गरिमा  बिक रही सरे बाज़ार  कदम ठिठक  गए  रूह  रुसवा  हुई  मित्रता की ठगी से  आचरण की विभस्ता  मन की कोमलता  पर वज्रपात  करती  आज की संवेदनहीनता  रिश्तों  में  आडंबर  कागजी  भावनाएं  मुर्दादिल  इंसान  वहशी  ख्वाहिशे  चित्कारती  धरती  गरजता  आसमां  दहला  रही अंतर्मन  क्यूकर  विश्वाश  करे  मनुजता  खो गयी कहीं  बहिनों   का सत्कार नहीं  बेटियों  की चाह नहीं  प्रेयसियों  के पीछे  रहना  अर्धांगिनी हो शालीनता भरी  बेटियों के दहेज़  पर बवाल  बहुओं  को दहेज  संग अपनाना  कराह रही है हर कोख  नीलाम होती तुलसी  सुर्ख़ियों  में कत्लेआम  निरुतर सवाल   अपराधी  बलव...