इंसानियत
इंसानियत चरमरा उठी 
पाषाण  ह्रदयों के प्रहार से 
शब्द  बिखर गए 
भावों  की गरिमा 
बिक रही सरे बाज़ार 
कदम ठिठक  गए 
रूह  रुसवा  हुई 
मित्रता की ठगी से 
आचरण की विभस्ता 
मन की कोमलता 
पर वज्रपात करती 
आज की संवेदनहीनता 
रिश्तों  में  आडंबर 
कागजी  भावनाएं 
मुर्दादिल  इंसान 
वहशी  ख्वाहिशे 
चित्कारती  धरती 
गरजता  आसमां 
दहला  रही अंतर्मन 
क्यूकर  विश्वाश  करे 
मनुजता  खो गयी कहीं 
बहिनों  का सत्कार नहीं 
बेटियों  की चाह नहीं 
प्रेयसियों  के पीछे  रहना 
अर्धांगिनी हो शालीनता भरी 
बेटियों के दहेज़  पर बवाल 
बहुओं  को दहेज  संग अपनाना 
कराह रही है हर कोख 
नीलाम होती तुलसी 
सुर्ख़ियों  में कत्लेआम 
निरुतर सवाल  अपराधी  बलवान 
नफरत सस्ती  मुहब्बत महंगी 
जीवन  क्रीडा  अंधकारमयी 
दुआवों पर रस्मी पहरा 
हर शक्स   का दर्द बड़ा 
अहंकार  की कश्ती पर खड़ा 
क्षणभंगुरता  भूल रहा 
अनमोल  जीवन खो रहा 
जीवन के झंझावतों  में 
जिन्दगानियां  बिखर रही !

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